Thursday, October 30, 2008

स्टार्टअप्स.कॉम डोमेन नाम २ करोड़ में बिका!

मंदी की मार जबरदस्त तरीके से पुरी दुनिया पे छाई हुई है, सिवाय शायद डोमेन असेट क्लास के. कम से कम ऐसा ही प्रतीत हो रहा है डोमेन की दुनिया से तो.

सोचने योग्य बात ये है, क्यों ये अक्षर इतने ज्यादा 'महंगे' बिकते हैं. या ऐसा कहूं इतने 'सस्ते'?

Wednesday, October 15, 2008

डोमेन नाम ५० करोड़ में बिका!

जी हाँ, इस साल सबसे महंगा डोमेन नाम बिकने का कीर्तिमान बनाया फंड.कॉम ने. इस नाम को ख़रीदा है न्यूयार्क की एक कंपनी ने 'ऑल कैश' डील में.

पिछले साल बिजनेस.कॉम बिका था १७२५० करोड़ में, हलाकि इस डोमेन के साथ इसका बिजनेस भी था, जिसे कुछ-एक साल लगे थे विकसित करने में दो मित्रो को. इन दोनों ने यह नाम जब १९९९ में ३७.५ करोड़ में ख़रीदा उस वक्त लोगो के आश्चर्य की सीमा नही थी और इनको लगभग पागल घोषित कर दिया गया था...:-)

Monday, October 13, 2008

गुलामी, अनुवांशिकी और इन्टरनेट

इस बात से शायद हम सभी सहमत हों की हम भारतीय आज भी दास प्रवृति से ग्रसित हैं. ठहरिये, अपने-आप को पुरा दोष ना दीजिये, इस प्रवृति का बुनियादी आधार है विदेशियों का भारत पर पिछले लगभग १००० सालो से राज करना. जेनेटिक्स में अदाप्टेशन नाम का एक सिद्धांत होता है, जिसका मतलब यह होता है की जीव जन्तु वातावरण/परिस्तिथि के अनुसार अपने आप को ढाल लेते हैं समय के साथ. यह बदलाव धीमे धीमे होता है एक लंबे समय तक. इस अनुक्रिया अवधि में इंसान का जेनेटिक कोड भी धीरे धीरे बदलता रहता है जिसका असर पड़ता है परिणाम स्वरुप उसकी आदत / प्रवृति पर. अब इतने लंबे समय तक हम गुलामी में रहे हैं तो लाजमी है आज हम में गुलामी अनुवांशिकी व्यवहार मौजूद है. लेकिन एक आशा कि किरण जरुर मौजूद है आज. वो है इन्टरनेट, जो एक महान इन्कलाब है साबित होगा भारत के लिए. इन्टरनेट में आज़ादी कि महक है और भारतियों को सक्षम बनने का बल. आशा है इन्टरनेट भारत से गुलामी कि बेडियों को तोड़ने में समर्थ होगा इसी कलयुग में. हालाँकि इसे बदलने में वक़्त लगेगा और पीढी दर पीढी निकल जाए इस प्रक्रिया में तो भी आश्चर्य न कीजियेगा क्यों कि यह प्रक्रिया बहुत धीमी होती है.

अब कभी आप शिवराज पाटिल जी को सोनिया जी के आगे शास्टांग प्रणाम करते देखे तो समझ जाईये कि काचर का बीज कौन है.

Sunday, October 12, 2008

नाम में क्या रखा है जनाब....और डोमेन नाम?

सब कुछ! जी हाँ सब कुछ। अगर मैं आपसे कहूं ताजमहल, तो आपके दीमाग में कुतुबमीनार की तस्वीर तो नही बनने वाली। ठीक उसी प्रकार, अगर मैं आपसे राष्ट्रपति भवन, या आपके शहर में मन्दिर का रास्ता पूछता हूँ तो आप मुझे सही रास्ता बता पाएंगे इसकी काफी सम्भावना है। लेकिन अगर मैं आपसे मेरे जैसे आम जन के पते का रास्ता पूछता हूँ तो आप सही रास्ता नही बता पाएंगे क्यों की आपको ऐसे पते का ज्ञान नही है। यह सब दर्शाता है नाम का महत्व.

कहते हैं हजारों सालो से पता (एड्रेस) प्रणाली एक प्रकार की ही रही है, हालाकि इस दरमियाँ बहुत प्रकार की क्रांतियाँ आई और गई। आम तौर पर पता ऐसे कुछ लिखा जाता है: गली नम्बर, इलाका, शहर, और फ़िर देश। कुछ इसी प्रकार है इन्टरनेट के एड्रेस की प्रणाली। इन्टरनेट की यह प्रणाली मैप होती है उन पर जिन्हें बोला जाता है डोमेन नाम. अद्भुत है इन्टरनेट की ये प्रणाली. उससे भी अद्बुत डोमेन नाम का संसार. इन्टरनेट के भ्रमांड में डोमेन नाम एक सितारे के समान होता है, जिसके चारो और विचरण करते रहते हैं इन्टरनेट के मुसाफिर. इस संसार की ख़ास बात यह है कि हर सितारे कि अपनी पहचान होती है और अलग नाम होता है. कुछ नाम बड़े होते हैं और कुछ के दर्शन छोटे होते हैं. कुछ नाम राजेश खन्ना कि तरह एवरग्रीन होते हैं जिनकी चहेती पुरी दुनिया होती है और कुछ नाम गुमनाम होकर रह जाते है. ऐसे ही कुछ नाम गगन चुम्बी इमारतों में तब्दील हो जाते है, मसलन ब्लागस्पाट.कॉम, जहाँ अनगिनत हिन्दी ब्लोग्गर्स आज डेरा डाले हुए हैं.

अनुमान है इस डोमेन संसार का तंत्र बनाने में खरबों रुपए खर्च हो चुके हैं. डोमेन तंत्र का इन्टरनेट सर्च और मार्केटिंग से बहुत गहरा सामजस्य और तार्किक संयोजन है, जिनके बारे मैं चर्चा करूंगा आने वाली पोस्ट में. डोमेन नाम एवं इन्टरनेट सर्च में मेरी गहरी रूचि रही और इनके बारे में मैं आप लोगो से और बहुत दिलचस्प बातें शेयर करता रहूँगा, मसलन क्यों और कैसे डोमेन नाम महत्वपूर्ण है आपके इन्टरनेट बिजनेस में, कैसे बड़ी बड़ी कंपनीयां भारत में अज्ञानी बनी बैठी हैं इस सितारे मंडल में, इत्यादि.

Saturday, October 11, 2008

सर आपकी जीनोम पत्री दिखाईये जरा...

कमाल करते हो जनाब, हम ही मिले थे क्या बेवकूफ बनाने के लिए। शायद ऐसा ही कुछ जवाब मिलेगा श्रीमान जी से अगर आपने उन्हें यह कह दिया की उनका २ मीटर लंबा डीएनए इतने छोटे कोशाणु बीज में समाया हुआ है उनके शरीर में की आँखों से देखा भी नही जा सकता। वे तो आप से कुट्टी कर बैठेंगे अगर आपने उनसे यह कह दिया की उनके हर लम्हे की जिंदगी इसी डीएनए से होकर गुजरती है। वे तो यह कहने लगेंगे की आपको कालिया के अमिताभ बनने की जरुरत नही है जिसमें अमिताभ कहता है, लाइन वहां से शुरू होती है जहाँ से कालिया खड़ा होता है।

परन्तु यह सब सच है।

और यह भी सच है कि इस २ मीटर के धागे में मौजूद है ३,००,००,००,००० अक्षरों की रेल लाइन नुमा पटरी, जो की ४ अक्षर (ऐ, सी, जी, टी) की वर्णमाला से बनी है। इस धागे में छुपा है कुबेर का खजाना याने कि अथाह ज्ञान का भण्डार जिसको सुलझाने/समझने के पीछे लगी है आज पुरी दुनिया। इस धागे में इतनी सुचना है जिसका अनुमानित आकार ५०० ब्रिटैनिका सारसंग्रह के बराबर है। और इसी धागे में ही मौजूद हैं अनुमानित ३०,००० जींस जो हर वक्त चुस्त रहते हुए और बिना शिकायत करते हुए शरीर कि कोश्काओं में प्रोटीन और अन्य कण बनाती रहती हैं। कब किस वक्त और आपके शरीर के किस कोने में कितनी मात्र में प्रोटीन बनाना है इन्हें बखूबी आता है। यही वो जींस है जो यह तय करती हैं कि आप गुस्सैल स्वाभाव के होंगे या ठंडे, या फ़िर आपके बालो या आँखों का रंग क्या होगा, या फ़िर आप गंजे कब होने लगेंगे.

इस धागे में जींस के अलावा अनगिनत काम के छोटे बड़े तत्व छुपे हैं, जिनको खोज निकालना एक बहुत बड़ी चुनौती है। इस काम को अंजाम देने के पीछे लगे हैं दुनिया भर के जीव और संगणक वैज्ञानिक। कुछ सफलता भी मिली है पीछे कुछ सालो में लेकिन दिल्ली अभी बहुत दूर है। यह पहेली आसान स्वरुप में कुछ इस प्रकार कि है जैसे मैं आपको अंग्रेज़ी में लिखा हुआ एक परिच्छेद दूँ और कहूं कि आप मुझे उसका मतलब समझा दें। आप बोलेंगे अरे यार आप भी, ये भी कोई समस्या है क्या, इसे तो मैं एक आँख से पढ़कर बता सकता हूँ कि उस परिछेद में क्या लिखा है। सही फ़रमाया आपने। अब अनुमान कीजिये, मैं आपको वही परिछेद रुसी भाषा में दूँ तो क्या होगा। फ़िर आपके माथे पे चिंता कि लकीरें आ जाएँगी और आप तलाशने लगेंगे गूगल का अनुवाद यन्त्र। लेकिन इतनी जल्दी नही कीजिये, पहेली अभी खत्म नही हुई है। अगर अब मैं उस परिछेद में से विराम चिह्न और शब्दों के बीच कि दूरी हटा दूँ तो। आप बोलेंगे यार आप तो मुझे अब यातना देने लग गए, यह सवाल तो गोल कमरे के सामान है जिसका कोना खोजने के लिए कह रहे है। जी हाँ, यहाँ बताई गई पहेली जीनोम कि खोज का एक बहुत छोटा सा अंश मात्र है।

वैसे मुझे ऐसा लगता है कि इंसान कि जन्म पत्री और जीनोम पत्री कही ना कही जाके मिलेंगी जरुर किसी न किसी रूप में। और इस रहस्य कि एक कड़ी का रास्ता अपने हिंदू ग्रंथों से होकर निकलता हो, शायद.

Tuesday, October 7, 2008

गूग्लिये की क़ैद में मेरा नया नवेला ब्लॉग ... और कृत्रिम बुद्धि!

कल गूगल ने मेरा ब्लॉगर अकाउंट निष्क्रीय कर दिया था स्पैम समझते हुए. उसी से याद आया के गूगल स्पैम आखिर मशीन (सॉफ्टवेर) ही तो है, इसलिए उससे गलती होना लाजमी है मर्फी कानून के नियम से. चलिए थोडी चर्चा करते हैं क्या है यह गूग्लिये की यह मशीन. यह कृत्रिम बुद्धि के बल पर यह तय करती है की कोई अकाउंट स्पैम है या नही. अब कृत्रिम बुद्धि क्या बला है यह देखते हैं. कृत्रिम बुद्धि याने की कृत्रिम तरीके से तईयार की गई बुद्धि. चलिए उधाहरण देखते हैं इसका:

आप जब अमिताभ की फ़िल्म १९७० में देखते तो यह निश्चित मान के चलते की उसमें एक्शन होगा. ऐसा क्यों? क्यों की आपके दीमाग ने अमिताभ की ऐसी ही कुछ परछाई सहेज के रखी हुई थी. तुलना कीजिये, किसी विदेशी से जिससे आप अमिताभ का जिक्र करेंगे तो वो बंगले झाकने लगेगा. यह इसलिए है क्यों की इंसान का देमाग हर वक्त नए एविडेंस की तलाश मैं रहता है जिनकी बुनियाद पर पुराणी छवि को सुधरता रहता है. यही वजह है आप कभी तो अपने पड़ोसी को अच्छा बताते हैं और कभी बुरा.

कृत्रिम बुद्धि आधारित मशीनें भी कुछ ऐसे ही काम करती हैं; नए एविडेंस की मौजूदगी में अपना नजरिया बदलती रहती हैं. अच्छा ये बताईये नारंगी रंग को आप ज्यादा लाल कहेंगे या ज्यादा गुलाबी? फंस गए ना जाल में! कुछ समस्याएँ ऐसी होती हैं जिनको एक कंप्यूटर इंसान से शायद ज्यादा समजदारी से सुलझा सकता है. कृत्रिम बुद्धि आधारित मशीनों का काम करने का स्टाइल कुछ वैसा ही होता है जैसे एक डाक्टर अपने मरीज की नब्ज़ टटोल कर और सवाल पूछ कर बीमारी निर्धारित करता है.

'गूगल स्पैम' भी अनेको सिग्नल एकत्रित करके उनका मिश्रण करते हुए यह फ़ैसला करता है की ईमेल/ब्लॉग पोस्ट अन्य स्पैम है या नही. और इस कार्यवाई में गणित का बहुत योगदान होता है.

Sunday, October 5, 2008

भारत चीन का गुलाम....!

चौकिये मत, यह सच भी हो सकता है! एक सशक्त राष्ट्र बनने में अगर भारत भविष्य में नाकाम होता है तो कुछ ऐसा ही होता नज़र आ रहा है. ठीक वैसे ही जैसे आज मेक्सिको का हाल है. वहां लोगो के पास खाने के पैसे नही है और उनकी रोजीरोटी अमेरिका के रहमोकरम पर निर्भर है. अमेरिका में आज मजदूरों की एक बड़ी खेप मेक्सिको से आती है. कहावत है 'विन्नर टेक्स आल', याने कि शक्तिमान का और शक्तिशाली होना और कमजोर का और कमजोर. यही वजह है कि भारत के पास आज आगे बढ़ने के अलावा कोई और विकल्प नही है. और इस विकल्प को हकीकत बनाने के पीछे सबसे बड़ा हाथ होगा अमेरिका का. यही वजह नींव है अमरीकी और भारत के बीच नुक्लेअर डील की. ऐसा नही है अमेरिका का भारत के प्रति ह्रदय परिवर्तन का कारण अमेरिका का दयाभाव है. ज्ञात रहे उपर दर्शायी गई कहावत को. ये कहानी है वर्चस्व की: अमेरिका और चीन के बीच की और भाग्य से यह वर्चस्व की राह भारत से होकर गुजरती है. अमेरिका भली भांति समजता है कि उनको एक उन्नत भारत से हाथ मिलाना बेहद आसन होगा बनिस्पत एक गरीब भारत से. क्यों की गरीब भारत को उन्नत चीन का गुलाम बनने से कोई नही रोक पायेगा. इसीलिए भारत ही नही अमेरिका के पास भी उन्नत भारत के सिवाय दूसरा विकल्प नही है। मेरा विचार है भारत का उदय होना निश्चित है, यहाँ का नेता ना चाहे तो भी, क्यों की यह अब अमेरिका की एक खास वजह बन चुकी है.